दर्शकों सहित फिल्म निर्माण क्षेत्र के हर किरदार को फिल्मों में हिंसा, अपराध, अश्लीलता और निर्लज्ज़ता का चित्रण के खिलाफ़ एकजुटता ज़रूरी - एड किशन भावनानी

दर्शकों सहित फिल्म निर्माण क्षेत्र के हर किरदार 

को फिल्मों में हिंसा, अपराध, अश्लीलता और

 निर्लज्ज़ता का चित्रण के खिलाफ़ एकजुटता 

ज़रूरी - एड किशन भावनानी



गोंदिया - भारत में अक्सर हम प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से पढ़ते व सुनते हैं कि, पूरी घटना फिल्मी अंदाज में घटी, फिल्मी अंदाज में डकैती, फिल्मी अंदाज में फिरौती को अंजाम दिया गया वगैरा-वगैरा, साथियों मेरा मानना है कि इस प्रकार की हेडलाइंस देने का कारण भी पाठकों, पाठन में रुचि रखने वालों और आम जनता को आकर्षित करने के लिए ही इस फिल्मी अंदाज का सहारा लिया जाता है और यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आज कुछअपवादों को अगर हम छोड़ दें तो जनता का एक बड़ा हिस्सा आज फिल्मों की तरफ आकर्षित है और हो भी क्यों ना ? आज भारत की जनसंख्या का 65 फ़ीसदी हिस्सा युवा है। फिल्में मनोरंजन का साधन है, युवाओं की दिलचस्पी है और इसमें बुराई भी नहीं है। बस!!! ज़रूरत है इस मनोरंजन के माध्यम को और अंदाज को कुछ बदलने की !!! साथियों बात अगर हम दशकों पहले की करें तो, जय संतोषी मां, क्रांति, मां अनेक प्रेरक फिल्में का युग भी हमने देखा, जिसमें लोगों को बहुत प्रेरणा मिली। परंतु आज़ बदलते परिवेश और पाश्चात्य सोच ने माहौल बदल दिया है, इस बदलते माहौल, बदलते किरदारों का दोष भी किसी एक व्यक्ति, समूह, क्षेत्र का नहीं है दे सकते!! इसमें भी हमारी सामूहिक सोच है, जिसे फ़िर सामूहिक सोच के बल पर ही बदला जा सकता है और सामाजिक बुराइयों से आम जनता को बचाया जा सकता है!! साथियों आज हम सब देखते हैं कि प्रिंट मीडिया, उनको उपलब्ध पुष्ठों के आधार पर फिल्मी जानकारी के लिए एक या अधिक पुष्ठ दिए जाते हैं क्योंकि पाठकों की रुचि होती है। याने हम सटीक अंदाज लगा सकते हैं कि आम नागरिकों को प्रभावित करने का सिनेमा एक बहुत बड़ा माध्यम है!! तो हम सबको सकारात्मकता से इस सिनेमा क्षेत्र के कौशलता का सामाजिक, नैतिक मूल्य, नीतिपरक संदेशों का वाहक बनाना होगा!! सिनेमा को आत्मनिर्भर भारत बनाने के तौर तरीके बताने का माध्यम और फिल्मी क्षेत्र वोकल फॉर लोकल के लिए प्रोत्साहित करने के लिए एक बहुत बड़ा प्लेटफार्म है हमारे पास!!! साथियों बात अगर हम उपरोक्त सभी बातों को धरातल पर हकीक़त में उतारने की करें तो यह किसी एक व्यक्तिज हीरो हीरोइन, निर्माता या फिल्म निर्माण के क्षेत्र के किसी एक किरदार का नहीं यह काम हर उस नागरिक और युवा साथी का है जो फिल्मी चित्र में रुचि रखता है। सिनेमा लाइन के हर किरदार का है यदि उपरोक्त बातों को लेकर सामूहिक सोचका क्रियान्वयन हो तो फिल्मों में हिंसा, घोर अपराध, अश्लीलता निर्लज्ज़ता का रोल बंदहो जाएगा और प्रेरक फिल्मों का प्रचलन बढ़ेगा!! साथियों बात अगर हम दिनांक 25 अक्टूबर 2021 को 67 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह की करें, जिसमें दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी दिया गया तो पीआईबी की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, भारत के उपराष्ट्रपति ने भी अपने संबोधन में, आज फिल्म निर्माताओं से अपनी फिल्मों में हिंसा, घोर अश्लीलता और निर्लज्‍जता का चित्रण करने से दूर रहने का आह्वान किया। यह देखते हुए कि एक अच्छी फिल्म में लोगों के दिल और दिमाग को छूने की शक्ति होती है। सिनेमा दुनिया में मनोरंजन का सबसे सस्‍ता साधन है। उन्होंने फिल्म निर्माताओं और कलाकारों से आग्रह किया कि वे इसका जनता, समाज और राष्ट्र की बेहतरी में उपयोग करें। उपराष्ट्रपति ने सिनेमा उद्योग को सलाह दी कि वह ऐसा कोई भी काम न करे जो हमारी सर्वोच्‍च सभ्‍यता की महान संस्कृति, परंपराओं, मूल्यों और लोकाचार को कमजोर करता हो। भारतीय फिल्में दुनिया पूरी दुनिया के दर्शकों को महत्वपूर्ण संदेश देती हैं। फिल्‍मों को बाहरी दुनिया के लिए भारतीयता का एक स्नैपशॉट प्रस्‍तुत करना चाहिए। उन्‍होंने इस बात पर भी जोर दिया कि फिल्‍मों को सांस्कृतिक कूटनीति की दुनिया में प्रभावी राजदूत बनने की ज़रूरत है।लोकप्रिय अभिनेता श्रीरजनीकांत को प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और विभिन्न भाषाओं की फिल्मों के अभिनेताओं को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करनेके बाद अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि फिल्मों को एक उच्च उद्देश्य वाला एक सार्थक वाहक होना चाहिए। फिल्मों को सामाजिक, नैतिक संदेश का वाहक होना चाहिए। उन्होंने कहा, इसके अलावा, फिल्मों को हिंसा को अधिक दिखाने से बचना चाहिए और सामाजिक बुराइयों की अस्वीकृति को आवाज देनी चाहिए। सकारात्मकता और खुशी लाने के लिए सिनेमा की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, अनुभव हमें बताता है कि संदेश देने वाली फिल्मों में मजबूत अपील होती है। उन्होंने कहा कि सिनेमा में मनोरंजन के अलावा ज्ञान प्रदान करने कीशक्ति भी है। उन्होंने कहा कि एक फिल्म को अच्‍छे उद्देश्य के साथ सामाजिक, नैतिक और नीतिपरक संदेशों का वाहक होना चाहिए। इसके अलावा फिल्मों को हिंसा को उजागर करने से दूर रहना चाहिए। फिल्‍म को सामाजिक बुराई के बारे में समाजकी अस्वीकृति की आवाज़ भी होनी चाहिए। दुनिया में फिल्मों के सबसे बड़े निर्माता के रूप में भारत की सॉफ्ट पावर काउल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी फिल्में पूरी दुनिया- जापान, मिस्र, चीन, अमेरिका, रूस, मध्य पूर्व, ऑस्ट्रेलिया और अन्‍य मेजबान देशों में देखी और सराही जाती हैं। उन्होंने कहा कि फिल्में हमारा एक सबसे प्रमुख सांस्कृतिक निर्यात हैं जो वैश्‍विक भारतीय समुदाय को उनके भारत में बिताए गए जीवन की लय से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में भी काम करती हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि, सिनेमा में मनोरंजन के अलावा ज्ञान कौशल प्रदान करने की शक्ति होती है उनको सामाजिक, नैतिक मूल्य और नीतिपरक संदेशों का वाहक होना चाहिए तथा दर्शकों सहित फिल्म निर्माण क्षेत्र के हर किरदार को फिल्मों में हिंसा और अपराध अश्लीलता और निर्लज्ज़ता का चित्रण के खिलाफ एकजुटता ज़रूरी है।


-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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