झारखंड बचाओ संघर्ष मोर्चा के आह्वान पर जन मुद्दा पर आज का प्रेस वार्ता

झारखंड बचाओ संघर्ष मोर्चा के आह्वान

 पर जन मुद्दा पर आज का प्रेस वार्ता








रांची, अवधेश कुमार यादव की रिपोर्ट : झारखंड बचाओ मोर्चा के आहवान को लेकर झारखंड प्रदेश के समस्त आदिवासी मूलवासी संगठनों को झारखंडी जन मुद्दों को लेकर विधायक लोबिन हेंब्रम ने अपने आवास पर प्रेस वार्ता मैं जानकारी दी कि: मारांड बुरू / पारसनाथ पर्वत में आदिवासी संताल समुदाय के आदिकालीन पूर्वज पिलचु आयो-पिलचु बाबा द्वारा स्थापित एक मात्र धर्मस्थल है, जिसे मारांड, बुरू जुग जाहेरथान एवं मारांड बुरू मांझी थान के नाम से विख्यात है। यहाँ पर देश-विदेश के कोने-कोने से संथाल समाज का पारम्परिक पर्व बाहा (सरहुल) पर्व, लौ-बीर सेंदरा पर्व इत्यादि के अवसर पर आदिवासी संताल धर्मालबियों, शोधार्थियों का आगमन होते आ रहा है।
हम आदिवासी संताल समुदाय के लोग जहाँ भी बसते हैं या बसे हैं हमारी धार्मिक परम्परा के अनुसार सर्वप्रथम गांव में एक मांझीथान एवं गांव के मौजा में एक जाहेरथान का स्थापित होना आवश्यक हैं। हमलोगों का उसी आधार पर मांझीथान, जाहेरथान प्रत्येक गांव में रहता है, परन्तु जुग जाहेरथान मात्र एक ही होता है जो अभी मारांड, बुरु / पारसनाथ पर्वत पर स्थित जुग जाहेरथान है। यह एक विश्व प्रसिद्ध जुग जाहेरथान होने के नाते झारखण्ड प्रदेश के तत्कालीन महामहिम राज्यपाल महोदया जो अभी भारत के राष्ट्रपति के रूप में विराजमान हैं, का भी दो बार इस पावन भूमि "जाहेरथान" में आगमन हुआ है। साथ ही इस जाहेरथान की सुरक्षा-व्यवस्था के लिए विशेष ध्यान देने हेतु जिला प्रशासन को हिदायत भी दी कि इस धार्मिक स्थलों में बहुत सी कमियों है, जैसे-तैसे स्थिति में है साथ ही इस पर्वत का नैसर्गिक सौदर्य, पवित्रता, वन सम्पदा असुरक्षित हो रहा है, जिसकी संरक्षण एवं सर्द्धन नितान्त आवश्यक है। दूसरी बात विगत वर्ष 2022 में संभवतः जैन समुदायों द्वारा पारसनाथ पर्वत / माराड, बुरू से संबंधित माननीय प्रधानमंत्री नई दिल्ली को दिए गए आवेदन के आधार पर प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत सरकार द्वारा स्थानीय अनुमंडल पदाधिकारी, डुमरी अंचल कार्यालय को पत्र प्राप्त हुई थी, उसी वस्तुस्थिति की जाँच पड़ताल कर उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री कार्यालय को भी प्रतिवेदन भेजी जा चुकी हैं। बात लगभग एक माह से दैनिक समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हो रहा है संभवत भवदीय भली-भाँति अवगत होंगे कि झारखण्ड प्रदेश गिरिडीह जिलान्तर्गत पारसनाथ पर्वत / मारांड, बुरू को पर्यटन स्थल एवं इसके ईद-गिर्द कई किलोमीटर क्षेत्र के अन्तर्गत मांस-मदिरा का सेवन वर्जित रहेगा को लेकर देश के विभिन्न क्षेत्रों में जैन समुदायों द्वारा धरना / प्रदर्शन किया जा रहा है साथ ही यह भी उल्लेख किया जा रहा है कि इस पारसनाथ / माराङ, बुरू क्षेत्र के आदिवासी / मूलवासी यानि गैर जैन को अंग्रेजों ने विदेशों से मजदूरी करने के लिए लाकर बसाया गया है. इस क्षेत्र में इनलोगों का कोई अधिकार नहीं है। इसका मतलब हम भारत के सभी आदिवासियों / मूलवासी शरणार्थी के रूप में जैनियों का बंधुवा मजदूरी के लिए बसाया गया और हम उनके गुलाम है क्या ? यह बहुत ही गंभीर एवं सोचनीय बात है।
इस संबंध में उल्लेखनीय बात यह है कि इस पारसनाथ / मारांड. बुरु मौजा में यहाँ के आदिवासी / मूलवासियों का कई सौ एकड़ जमीन पर हजारों लोग खतियानी रैयत हैं जो अभी उनके आबादी में है।
एक तरफ सरकार हमारी धार्मिक पहचान बनाये रखने हेतु प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ हमारी धार्मिक स्थल को मिटाने के लिए एड़ी-चोटी कर रही है। उदाहरण रूवरूप इसी पर्वत की तलहटी में स्थित मांझीथान के पहचान को उखाड़ कर फेंका गया जबकि पर्वत पर सैकड़ों बोर्ड (पहचान) लगा हुआ है उस पर कोई आपत्ति नहीं है। इससे साफ स्पष्ट होता है कि यहाँ के आदिवासियों / मूलवासियों को गुलाम एवं जैन लोग अपने को जमींदार / जागीरदार समझते है। यह उनकी कैसी मंशा है, उसकी पहचान को खत्म करना और जबकि मधुबन में जैन समुदाय द्वारा निर्मित कोठी एवं धर्मशाला सभी आदिवासी / मूलवासी की जमीन पर है।
हमारे ईष्ट देव मारांड बुरू और भगवान महावीर द्वारा हजारों वर्षों से इस पर्वत की पावन भूमि को पवित्र बनाये रखा जिससे आज इसे विश्व पटल पर प्रसिद्ध धर्म गढ़ / मन्दिर के नाम से विख्यात है, या जाना जाता है परन्तु आज इसे कौन अपवित्र कर रहा है. इस पर गंभीरता से सोचने/ विचारने की आवश्यकता है ताकि एक दूसरे की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुँचे। हमलोग स्वभाव से ही शान्ति प्रिय व्यक्ति हैं संविधान प्रदत्त नियम कानूनों का सम्मान करते है. एक दूसरे के प्रति भाईचारे का संबंध बनाये रखना ही मेरा स्वभाव रहा है परन्तु मेरी धार्मिक
आस्था, भावनाओं पर कोई बेवजह का छेड़-छाड़ करेगा तो उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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