डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद का संक्षिप्त जीवन वृतांत.

डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद का

 संक्षिप्त जीवन वृतांत.




किसानों, पशुपालकों एवं सहकारिता क्षेत्र के लोगों के साथ ही कृषि क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों और संपूर्ण कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहित-उत्प्रेरित करने के लिये वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद के विचारों एवं जीवन का संक्षिप्त परिचय.

झारखण्ड की छवि खनिज संसाधन, उद्योग-धंधे, वाणिज्य एवं अन्य संबंधित क्षेत्रों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक समर्थित प्रदेश की रही है. लेकिन वास्तविकता यह है कि कृषि, वानिकी, पशुपालन एवं सहकारिता क्षेत्र में भी झारखण्ड की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय है. इन सभी क्षेत्रों में झारखण्ड का योगदान राष्ट्रीय स्तर पर उल्लिखित है.

झारखण्ड में हजारीबाग जिले के इचाक प्रखण्ड के मूल निवासी डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद का जन्म इचाक में 16 सितम्बर 1937 को हुआ. इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा इचाक से ही पूर्ण की और उसके बाद हजारीबाग के सुप्रसिद्ध सेंट कोलंबस कॉलेज से इन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की. राजेन्द्र कृषि कॉलेज काँके, रांची से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक शैक्षणिक उपलब्धियाँ प्राप्त की और अपना पूरा जीवन वरीय कृषि वैज्ञानिक के रूप में व्यतीत करने के साथ ही उन्होंने किसानों की हित में अनेक वैसे अनुसंधान किये जिसके कारण आज भी किसान लाभान्वित हैं.

राजेन्द्र कृषि कॉलेज, काँके, रांची से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद डॉ. प्रसाद ने कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की. प्लांट ब्रीडिंग एवं जेनेटिक्स में इन्होंने पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की और अपने-आप को पूरी तरीके से कृषि क्षेत्र, विशेषकर चावल की नयी प्रजातियों या किस्मों के विकास के लिये समर्पित कर दिया. डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि उन्होंने उच्च शिक्षा के दौरान अनेक गोल्ड मेडल प्राप्त किये और कृषि क्षेत्र में अपने अनुसंधान का कार्य अपने अध्ययन अवधि में ही प्रारंभ कर दिया था.

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि वह प्रयोगशाला की बजाय खेतों को ही अपना कार्य क्षेत्र मानते थे और उनका अनुसंधान पूरी तरीके से जमीनी स्तर पर खेत-खलिहान और किसानों से बहुत अधिक प्रभावित था. अनुसंधान के दौरान वे मुख्य रूप से किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों और मौसम का विशेष ध्यान रखते थे. यही कारण है कि उन्होंने चावल की अनेक वैसी प्रजातियाँ विकसित की जिसकी उपज, कम पानी अर्थात कम सिंचाई में भी पर्याप्त होती है और वैसी किस्में आज न केवल झारखण्ड या देश के अन्य पूर्वी प्रदेशों, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर पूर्वी राज्यों बल्कि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत ही प्रसिद्ध है. अफ्रीका के अनेक देशों में उनके द्वारा विकसित चावल की प्रजातियाँ अभी भी किसानों के बीच बहुत अधिक सुविधाजनक और लोकप्रिय है.

केन्द्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, कटक और अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, मनीला, फिलिपींस में अपने दायित्व का निर्वहन कर चुके डॉ. प्रसाद ने अपना संपूर्ण जीवन, ग्रामीण क्षेत्र, किसानों और खेती के विकास के लिये समर्पित कर दिया. अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, उत्तर अमेरिका, अनेक यूरोपीय देशों, फिलीपींस, जापान, अफ्रीका के अनेक देशों में उन्होंने विशेष आमंत्रित विशेषज्ञ वक्ता के रूप में कृषि पर व्याख्यान दिया जिसमें से अधिकांश का मुख्य बिन्दु पठारी क्षेत्रों अर्थात, कम सिचाई वाले क्षेत्रों में धान (चावल) की खेती रही.

कृषि के हित में अपने दिल-दिमाग और ज्ञान का सटीक सदुपयोग करने वाले डाॅ. प्रसाद ने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं फॉर्म एण्ड सीड्स डिपार्टमेंट के निदेशक के रूप में सेवानिवृत्ति प्राप्त की. इसके बाद यूनिवर्सिटी ऑफ वेल्स लंदन से इंटरनेशनल फण्ड फॉर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (इफाड या IFAD) के तहत इन्होंने काम किया. जीबीटी अर्थात ग्रामीण विकास ट्रस्ट के साथ यह एक संयुक्त परियोजना थी.

डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद ने चावल की वैसी 52 किस्मों का विकास किया जो कहीं कम पानी में अधिक उपज देती है. जिसमें झारखण्ड के पठारी क्षेत्रों के लिये विकसित चावल की नयी किस्में कंचन, कावेरी, बाला, बिरसा धान 101 से 110 तक, किसानों के मध्य अत्यंत लाभदायी साबित हुई.

अपने अनुसंधान के दौरान डॉ. प्रसाद ने जीवन भर न केवल भारत बल्कि, पूरी दुनिया के किसानों की आवश्यकताओं व आकांक्षाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. अपने अनुसंधान के सिलसिले में इन्होंने यूरोप के अनेक देशों, उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका के अनेक देशों के साथ ही एशिया के अनेक देशों की भी यात्रा की. परन्तु इन्होंने अपने भारत के विभिन्न प्रदेशों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. डाॅ. प्रसाद ने अफ्रीका में जाम्बिया, तंजानिया और नाइजीरिया के दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर चावल का गहन अनुसंधान किया और इसका बहुत अधिक फायदा न केवल अफ्रीका बल्कि, पूरी दुनिया के किसान उठा रहे हैं.

भावनात्मक रूप से किसानों से गहराई से जुड़े डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद की मान्यता बिल्कुल स्पष्ट है. किसान केवल अपनी आय के लिये कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों पर निर्भर वैसे व्यक्ति हैं जो अपने और अपने परिवार के जीवन-यापन के लिये काम करते हैं. उनके योगदान का कोई विकल्प नहीं है क्योंकि वास्तव में वे ही हमारे अन्नदाता हैं और हमारे जीवन में अन्नदाता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है. किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना हमारे अपने हित में अर्थात, राष्ट्रीय हित में है. हमें अपने जीवन के लिये पूरी तरीके से अनाज, फलों और सब्जियों पर निर्भर रहना पड़ता है जो खेती के कारण ही संभव है और खेती प्रकृति से ही हो सकती. इसलिये इसे महत्व देना ही होगा. यदि इसमें कोई भी कोताही की गयी तो इसका खामियाजा न सिर्फ हमें बल्कि आने वाली पीढियों को भी भुगतना पड़ेगा. डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद न केवल खेती-किसानी बल्कि, पर्यावरण को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे. उनका यह मानना है कि जलवायु असंतुलन और पर्यावरण असंतुलन का खामियाजा, खेती-किसानी के साथ सभी क्षेत्रों को उठाना पड़ेगा. बाढ़, सूखा आदि का भी मूल कारण जलवायु में परिवर्तन है और उसका अफसोस जनक आधार, उद्योग और व्यवसाय पर जरूरत से अधिक निर्भरता है जिसके दबाव का खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है. पारिस्थितिकी तंत्र के साथ ही ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या के असंगत अनुपात को भी वे देश-दुनिया और पर्यावरण के साथ ही, खेती-किसानी के विरुद्ध मानते थे.

सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डाॅ. सतीश चन्द्र प्रसाद के अनुसार झारखण्ड न केवल परंपरागत कृषि, वानिकी, पशुपालन, सहकारिता आदि में बल्कि, परिष्कृत एवं किसानों के लिये कहीं अधिक उपयोगी व व्यावहारिक कृषि-वानिकी (Agrisilviculture), काष्ठ उत्पादन (Woodlots), सड़क व नहर किनारे वानिकी (Linear Strip Planting), कृषि-बागवानी (Agrihorticulture), कृषि व फल (Orchards), फल उत्पादन (Pomology), सब्जी उत्पादन (Olericulture), वन-चारागाह (Silvopasture), चारागाह प्रबंधन (Pasture Management) पशुपालन (Livestock), उद्यान-चारागाह (Hortipasture) के तहत फलों के पेड़ों और पशुओं के चारे का मिश्रण उत्पादन, उद्यानिकी (Horticulture), कृषि-वन-पशुपालन (Agrosilvopasture), कृषि वानिकी (Farm forestry) जैसे सभी संबंधित क्षेत्रों में भी न केवल देश बल्कि, विश्व को रास्ता दिखा सकता है. बेहतर पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने के लिये उन्होंने इसे दीर्घकालिक स्तर पर भी बेहतर बताया था.

डॉ. प्रसाद का पूरा जोर और दबाव एक वैसे आदर्श जीवन की ओर था जहाँ हर व्यक्ति खेती-किसानी, पशुपालन और सहकारिता के महत्व को समझे. आपसी सद्भाव से खेती-किसानी करें और एक-दूसरे की सहायता करते हुए आगे बढ़े.

डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद मूल रूप से कृषि वैज्ञानिक थे लेकिन झारखण्ड, यहाँ के प्राकृतिक वातावरण, जल-जंगल-जमीन के साथ ही यहाँ के लोगों के साथ भी उनका अद्भुत जुड़ाव था. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक अद्भुत प्रस्ताव प्राप्त होने के बाद भी उन्होंने ना तो बिरसा कृषि विश्वविद्यालय को छोड़ा और न ही रांची का परित्याग किया.

बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में 1998 में अवकाश प्राप्ति तक पूरी जिम्मेदारी से विश्वविद्यालय प्राध्यापक और मुख्य वैज्ञानिक का दायित्व निभाने वाले डाॅ. प्रसाद ने सेवानिवृत्ति के बाद भी लगातार इंटरनेशनल फण्ड फाॅर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट (इफाड या IFAD) का कार्य करते रहे. अवकाश प्राप्ति के बाद पूरे झारखण्ड में गरीब किसानों की आय को बढ़ाने के लिये संथाल परगना से छोटानागपुर के कई जिलों के गाँवों को उन्होंने मॉडल बनाया और निर्धन आदिवासी परिवारों के बीच सोनाली ब्रिड की 10 मुर्गियों और दो मुर्गों का नि:शुल्क वितरण कर उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार का सार्थक प्रयास किया. इससे झारखण्ड के हजारों किसानों की आय में वृद्धि हुई.

2023 तक अर्थात अपने जीवन के अंतिम समय तक वे साहेबगंज से चाईबासा तक मतलब झारखण्ड के प्रत्येक जिले में जाकर किसानों के हित में काम करते हुए उन्हें जागरूक करते रहे.

अपने जीवन काल में उन्होंने बहुत लम्बी अवधि, 65 वर्ष से भी अधिक समय तक किसानों और कृषि क्षेत्र के प्रति योगदान दिया जो अद्वितीय है. डॉ. प्रसाद ने कृषि क्षेत्र के समन्वित विकास के लिये दर्जनों शोध पत्र और पुस्तकें भी लिखी.

अपने जीवन का अंतिम क्षण उन्होंने झारखण्ड अर्थात रांची में मोरहाबादी स्थित अपने आवास में गुजारते हुए अपना जीवन व्यतीत किया. 7 फरवरी 2023 को उनका निधन हो गया.

डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद की विचारधारा और उनके जीवन के साथ ही, जीवन में अर्जित अनुभव से कृषि, वानिकी, पशुपालन, सहकारिता आदि क्षेत्रों में किसी भी रूप में जुड़े लोग बहुत अधिक उत्प्रेरित हो सकते हैं. इससे वैसे लोग झारखण्ड के हित में कहीं अधिक बेहतर स्वरूप में अपना रचनात्मक, सकारात्मक और क्रियात्मक योगदान दे सकते हैं. यह न केवल डॉ. सतीश चन्द्र प्रसाद को व्यावहारिक स्तर पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी बल्कि वास्तव में इससे हमारे झारखण्ड की समृद्धि के साथ-साथ, यहाँ संबंधित क्षेत्र में कार्यरत लोगों की आय में भी वृद्धि होगी और उनका जीवन स्तर ऊँचा उठेगा.

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